Thursday, 9 April 2015

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"झाड़ू"
'झाड़ू' एक प्रातिपादिक है,जिसका अभिप्राय सम्मार्जन करना है। सम्मार्जन का तात्पर्य साफ सफाई से है। यानी झाड़ू स्वच्छता का पर्याय है। झाड़ू बहुआयामी है। झाड़ू से कई काम लिया जाता है। पर झाड़ू का मुख्यतया प्रयोग साफ सफाई करने में ही किया जाता है। मेरे हिसाब से झाड़ू अव्यक्त गुरु भी है। जिस तरह से गुरु अपने शिष्यों के भीतर की गन्दगी साफ करते हैं ठीक उसी तरह झाड़ू भी घर के अंदर की गन्दगी साफ करती है। झाड़ू का स्वरुप कुछ खास मायने नही रखता अपितु उसका कार्य की उसकी रचना है। साफ सफाई करने के लिए झाड़ू का प्रयोग प्रत्येक घर में किया जाता है। यह अलग बात है कि यहाँ गुणवत्ता के आधार पर झाड़ू का विभाजन हो जाता है। प्राचीन काल में झाड़ू झाड़दार औषधीय पौधों को काटकर बनाई जाती थी जिससे सफाई के साथ - साथ कीटाणुओं का भी सफाया हो सके। लेकिन इस हाईटेक कलयुग में झाड़ू का प्रयोग सिर्फ झाड़ने(साफ सफाई)के लिए हो रहा है। दुर्भाग्य यह भी है कि झाड़ू का समूल रूप भी विलुप्त हो चला है।
    साधारण या गाँव देहात की भाषा में झाड़ू को 'बढ़उनी ' भी कहा जाता है। बढ़उनी का तात्पर्य यहॉं बढ़ाने से है। जिसका सार्थक अर्थ है। लेकिन यहाँ विरोधाभाष भी है कि झाड़ू क्या और कैसे बढाती है। क्योकि झाड़ू की प्रकृति प्रयोगनुसार अनवरत घटने की है। लेकिन वास्तव में झाड़ू बहुत कुछ बढ़ाने का काम करती है। झाड़ू से घर साफ होता है तो स्वच्छता बढती है, स्वच्छता बढती है तो सुंदरता बढ़ती है। इन सबसे सबके उपरांत घर की बरक्कत भी बढती है। शायद इसीलिए इसे बढ़उनी कहा गया। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि झाड़ू के रूप की नही कार्य की सार्थकता है।
    झाड़ू की चर्चा आजकल हर गली मुहल्ले में है। क्योकि झाड़ू अब राजनीति के बाजार में बिकने लगी है। झाड़ू को लोग अब सिर्फ साफ सफाई के लिए ही नही बल्कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए भी पकड़ने लगे हैं। दिल्ली विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को चुनाव चिन्ह झाड़ू क्या मिला कि झाड़ू का दाम भी बढ़ गया और सम्मान भी। झाड़ू के आकर प्रकार में कोई खास बदलाव नही हुआ लेकिन यही झाड़ू ऐसे गणमान्य लोगों के हाथ में दिखने लगी जो शायद कभी झाड़ू को हाथ भी लगाये हों। बहरहाल आम आदमी पार्टी के लोगों ने झाड़ू का भरपूर सदुपयोग किया। हर गली मोहल्ले में झाड़ू लगाया और लोगो को झाड़ू की सार्थकता को समझाया। हालाँकि झाड़ू एक मात्र प्रतीक था लेकिन इस प्रतीक ने दिल्ली में सभी राजनीतिक पार्टियों का सफाया कर दिया। और इसी झाड़ू को लगाकर  केजरीवाल सत्ता के गलियारे तक पहुँच गए। फिर क्या झाड़ू के इस कमाल को देखकर बड़े - बड़े दिग्गज ( जो वाह्य और अभ्यांरत दोनों तरह से गंदे हैं )भी राजनीतिक रोटियाँ सेकने के लिए सडको पर झाड़ू लगाना शुरू कर दिए। यह बात अलग है कि इस झाड़ू को पकड़कर कुछ लोग हीरो बन गए तो कुछ ज़ीरो हो गए। यहां झाड़ू की सार्थकता को दृष्टिगत किया जाये तो आम आदमी पार्टी के लोगों ने समाज में व्याप्त अराजकता और भ्रष्टाचार को साफ करने के लिए झाड़ू हाथ में उठाया था। यानी यहां पर झाड़ू की सार्थकता प्रतीकात्मक थी।
       केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद पहली बार देश के प्रधानमंत्री के हाथ में झाड़ू देखी गईं। चकाचक कुर्ता , पजामा और सदरी पहने पीएम नरेंद्र दामोदर दास मोदी हाथ में झाड़ू लेकर निकल पड़े सड़क पर साफ सफाई करने के लिए। टेलीविजन पर इस नज़ारे को सारी दुनिया ने देखा। यह देखकर लोगो को बहुत आश्चर्य भी हुआ। कुछ लोगों को तो यकीन नही हो रहा था कि यह पीएम मोदी हैं या उनका कोई हमशक्ल। लेकिन सच यही था कि पीएम मोदी दिल्ली की सड़क पर झाड़ू लगा रहे थे और समूर्ण देश वासियों को स्वच्छता का पाठ पढ़ा रहे थे। पीएम मोदी का सीधा सन्देश था यह देश की जनता के लिए। यहां पर स्वार्थ नही, देश हित की बात हो रही थी। शायद इसीलिए उन लोगों ने भी अपने हाथ में झाड़ू पकड़ लिया जो कभी सपने में भी नहीं सोचे रहे होंगे। क्योकि यहां पर झाड़ू पकड़ना गौरव का प्रतीक बन गया। लिहाज़ा यहां पर मोदी की झाड़ू की सार्थकता बोधात्मक थी।
  झाड़ू बहुआयामी है यह भी स्पष्ट हुआ। साफ सफाई के साथ-साथ झाड़ू की सार्थकता प्रतीकात्मक, बोधात्मक और भावात्मक जौसे तमाम रूपों परिणित होती देखी जा सकती है। बसरते स्थिति का सही आकलन हो। तभी तो आज हालात यह भी है कि झाड़ू को सिर्फ साफ सफाई के उद्देश्य से ही नही बल्कि हाथ में पकड़कर आम आदमी का बोध कराते हुए फोटो खीचने के लिए भी खरीदी जा रही है। वर्तमान राजनीति के परिपेक्ष में झाड़ू ने सामाजिक भेदभाव कम करने का भी काम किया है। हाथ में झाड़ू पकड़ने में लोगों को कोई गुरेज नही। गुरेज होना भी नही चाहिए क्योकि झाड़ू का किसी भी प्रयोजन से प्रयोग किया जाये उसकी सार्थकता कम नही होती और सदुपयोग भी भरपूर होता है। हालाँकि झाड़ू का द्रुपयोग नही होता यह कहना भी बेमानी होगी।

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